कमोबेश दुनिया के हर छोटे-बड़े होटलों में हमें नया साबुन, मॉश्चराइजर, टूथपेस्ट और ऐसे ही तमाम प्रसाधन मिलते हैं। कई बड़े होटल्स में ये साबुन-शैम्पू हर दिन बदले भी जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि जिन साबुन, शैम्पू, मॉश्चराइजर, टूथपेस्ट आदि का हम इस्तेमाल नहीं करते या आधा ही इस्तेमाल कर पाते हैं, उनका होता क्या है?
होटल रूम की सुविधाएं और एक अनदेखा सवाल
जब भी हम किसी होटल में ठहरते हैं, तो कमरे में रखे साबुन, शैम्पू, मॉश्चराइजर, टूथपेस्ट और कंडिशनर जैसी सुविधाएं आम बात लगती हैं। कई नामी होटलों में ये सामान हर दिन बदले जाते हैं, चाहे उनका इस्तेमाल हुआ हो या नहीं।
लेकिन शायद ही कोई यह सोचता है कि आधे इस्तेमाल किए गए या बिल्कुल नए बचे उत्पादों का आगे क्या होता है। क्या उन्हें सीधे कूड़ेदान में डाल दिया जाता है, या फिर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है? यही सवाल इस पूरी कहानी की शुरुआत है।
आसान जवाब, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं
पहली नजर में यही लगता है कि जो साबुन या शैम्पू आधा इस्तेमाल हुआ, उसे फेंक दिया जाता होगा। और जो पैक्ड हैं, उन्हें अगले मेहमान को दे दिया जाता होगा। यह बात सुनने में सही लगती है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। होटल इंडस्ट्री में इस विषय को लेकर अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं।
पहले सीधे कचरे में जाते थे उत्पाद
करीब 9-10 साल पहले तक अधिकतर होटलों में इस्तेमाल किए गए या बचे हुए प्रसाधनों को सीधे कूड़ेदान में डाल दिया जाता था। हर दिन लाखों की संख्या में ऐसे उत्पाद निकलते थे, जो कचरे का हिस्सा बनकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते थे।
इसी दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट ने इस मुद्दे पर ध्यान खींचा। रिपोर्ट में बताया गया कि होटल के कमरों से बर्बाद होने वाले साबुन और शैम्पू, एक ओर जहां कचरा बढ़ा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर यह गरीबों की स्वच्छता समस्या का समाधान भी बन सकते हैं।
हर दिन लाखों साबुन-शैम्पू बेकार
भारत जैसे देश में अनुमान है कि 1 से 1.5 लाख होटल कमरे हैं। हर दिन इनमें ठहरने वाले मेहमानों द्वारा लाखों साबुन और अन्य प्रसाधन आधे इस्तेमाल रह जाते हैं। सिर्फ साबुन ही नहीं, बल्कि शैम्पू, कंडिशनर, मॉश्चराइजर और बॉडी वॉश भी बड़ी मात्रा में बच जाते हैं। कल्पना कीजिए कि सालभर में यह संख्या कितनी बड़ी हो सकती है। यही वह बिंदु था, जहां से बदलाव की शुरुआत हुई।
एनजीओ की पहल और जागरूकता अभियान
साल 2009 के आसपास कई एनजीओ और सामाजिक संस्थाओं ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। ‘क्लीन द वर्ल्ड’ और ‘ग्लोबल सोप प्रोजेक्ट’ जैसी संस्थाओं ने होटलों से बचे साबुन और अन्य उत्पादों को इकट्ठा करने की मुहिम शुरू की। इन संगठनों ने साबित किया कि बचे हुए साबुन को रिसाइकल कर नया साबुन बनाया जा सकता है और उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाया जा सकता है।
रिसाइकल की प्रक्रिया कैसे होती है
आधे इस्तेमाल किए गए साबुनों को पहले इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद उन्हें विशेष प्रक्रिया से साफ, कीटाणुरहित और शुद्ध बनाया जाता है। फिर इनसे नए साबुन तैयार किए जाते हैं। इसी तरह शैम्पू और अन्य तरल उत्पादों को भी सुरक्षित तरीके से पुन: उपयोग के योग्य बनाया जाता है। रिसाइकल के बाद इन उत्पादों की गुणवत्ता की जांच की जाती है, ताकि वे पूरी तरह सुरक्षित हों।
विकासशील देशों में भेजे जाते हैं उत्पाद
रिसाइकल किए गए साबुन और अन्य प्रसाधनों को उन क्षेत्रों में भेजा जाता है, जहां स्वच्छ पानी और सैनिटेशन की सुविधा सीमित है। गरीब और विकासशील देशों में गंदगी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। इन साबुनों के वितरण से वहां के लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता और स्वास्थ्य सुरक्षा बढ़ती है।
स्थानीय स्तर पर भी पहल
सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही नहीं, बल्कि कई स्थानीय एनजीओ भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। वे होटलों से रोजाना बचे हुए उत्पाद इकट्ठा करते हैं और जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं। हालांकि सीधे बांटने से पहले उत्पादों को रिसाइकल और शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजरना जरूरी होता है।
सभी होटल नहीं अपनाते यह तरीका
होटल व्यवसाय से जुड़े विशेषज्ञ लुईस हर्मन के अनुसार, हर होटल यह पहल नहीं अपनाता। कुछ होटल ऐसे हैं, जो अनउपयोग किए गए पैक्ड उत्पादों को दोबारा मेहमानों को दे देते हैं, क्योंकि यह खाद्य पदार्थ नहीं होते। लेकिन अभी भी कई होटल बचे हुए साबुन और शैम्पू को सीधे फेंक देते हैं, जिससे अनावश्यक कचरा बढ़ता है।
पर्यावरण और समाज के लिए बड़ा संदेश
यह पहल न केवल कचरे को कम करती है। बल्कि गरीबों की स्वच्छता और स्वास्थ्य में सुधार लाने में भी मददगार है। होटल इंडस्ट्री का यह बदलाव दिखाता है कि छोटी-सी चीज भी बड़े सामाजिक बदलाव का कारण बन सकती है। यदि सभी होटल इस मॉडल को अपनाएं, तो हर साल लाखों टन कचरा कम किया जा सकता है और जरूरतमंदों को स्वच्छता के साधन मिल सकते हैं।