भारत में सड़क दुर्घटनाएं अब सिर्फ खबर नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय संकट बन चुकी हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग हर तीन मिनट में एक व्यक्ति सड़क हादसे में जान गंवा रहा है। यह स्थिति केवल मानवीय लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि कई बार खराब सड़क डिजाइन, गड्ढे, गलत कट, ओवरस्पीडिंग और कमजोर निगरानी तंत्र भी इसके पीछे बड़ी वजह बनते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सिस्टम मजबूत हो, चालान की सख्ती से मॉनिटरिंग हो और जिला स्तर पर ठोस कार्रवाई हो, तो हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।
द्वारका हादसा बना चेतावनी
3 फरवरी को दिल्ली के द्वारका में एक दर्दनाक हादसा हुआ। तेज रफ्तार स्कॉर्पियो की टक्कर से एक बाइक सवार युवक की मौत हो गई। बाद में जांच में सामने आया कि जिस गाड़ी से हादसा हुआ, उस पर 13 चालान पेंडिंग थे।
यह मामला केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की बड़ी खामी को उजागर करता है। सवाल उठता है कि इतने चालान लंबित होने के बावजूद वाहन सड़क पर कैसे दौड़ रहा था?
मॉनिटरिंग सिस्टम पर सवाल
विशेषज्ञों ने इसे मॉनिटरिंग की विफलता बताया। उनका कहना है कि यदि पेंडिंग चालान पर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद यह हादसा टल सकता था।
आईआईटी दिल्ली में आयोजित नेशनल रोड सेफ्टी कॉन्फ्लुएंस में इस मामले की गहन समीक्षा की मांग उठी। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे हर केस का अध्ययन होना चाहिए ताकि सिस्टम की कमियां सामने आएं और सुधार के रास्ते बनें।
IIT दिल्ली में बड़ा मंथन
भारत एसोसिएशन ऑफ रोड सेफ्टी (BARS) की ओर से आईआईटी दिल्ली में यह कॉन्फ्लुएंस आयोजित किया गया। इसमें देश-विदेश के विशेषज्ञ, सरकारी अधिकारी और नीति निर्माता शामिल हुए।
कार्यक्रम में सड़क सुरक्षा घोषणापत्र (Road Safety Manifesto) लॉन्च किया गया, जिसका लक्ष्य है कि 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत कमी लाई जाए।
पांच चालान पर लाइसेंस सस्पेंड?
रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवे मंत्रालय के सेक्रेटरी वी. उमाशंकर ने स्पष्ट संकेत दिया कि अब सख्ती बढ़ाई जाएगी। उन्होंने कहा कि पांच चालान पेंडिंग होने पर ड्राइविंग लाइसेंस सस्पेंड करने पर विचार चल रहा है। यह कदम यदि लागू होता है, तो लापरवाह ड्राइवरों पर बड़ा असर पड़ेगा। इससे लोगों में नियमों के प्रति जिम्मेदारी बढ़ सकती है।
केवल जागरूकता नहीं, ठोस एक्शन जरूरी
सेक्रेटरी उमाशंकर ने कहा कि हर दुर्घटना व्यक्तिगत होती है और हर मौत रोकी जा सकती है। केवल जागरूकता अभियान चलाने से काम नहीं चलेगा। जरूरत है डिस्ट्रिक्ट-लेवल एक्शन प्लान, मजबूत संस्थागत सपोर्ट और सख्त एनफोर्समेंट की। चालान निपटाने के आसान रास्तों को बंद करना होगा, ताकि नियम तोड़ने वालों को राहत न मिले।
इंश्योरेंस कंपनियों की भूमिका
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि इंश्योरेंस कंपनियां वाहन का रिन्यूअल करने से पहले पेंडिंग चालान की जांच करें। यदि वाहन पर कई चालान लंबित हैं, तो बीमा रिन्यूअल रोका जाए या अतिरिक्त जांच की जाए। इससे वाहन मालिकों पर नियमों का पालन करने का दबाव बनेगा।
वालंटियर मॉडल और डेटा स्टडी
भीड़भाड़ वाले इलाकों में वालंटियर तैनात करने का सुझाव भी दिया गया। ये वालंटियर स्थानीय समस्याओं की स्टडी कर संबंधित जिले को रिपोर्ट देंगे।
इस रिपोर्ट के आधार पर ब्लैक स्पॉट की पहचान, सड़क डिजाइन सुधार और ट्रैफिक मैनेजमेंट में बदलाव किए जा सकते हैं।
ग्लोबल एजेंडा में रोड सेफ्टी
डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल लीड डॉ. मैट्स-आके बेलिन ने कहा कि रोड सेफ्टी अब वैश्विक एजेंडा का हिस्सा है।
उन्होंने जोर दिया कि जागरूकता से आगे बढ़कर सबूत आधारित नीति (Evidence-Based Policy) लागू करनी होगी, ताकि कोई भी देश सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों को रोकने में पीछे न रहे।
रोड सेफ्टी: गवर्नेंस की जिम्मेदारी (Governance Responsibility)
बीएआरएस के चेयरमैन रमा शंकर पांडे ने कहा कि रोड सेफ्टी केवल ट्रांसपोर्ट विभाग का विषय नहीं है। यह गवर्नेंस की नैतिक जिम्मेदारी है। जब तक नीति, कानून, एनफोर्समेंट और समाज एक साथ काम नहीं करेंगे, तब तक बदलाव संभव नहीं है।
घोषणापत्र के पांच स्तंभ
सड़क सुरक्षा घोषणापत्र में पांच प्रमुख बिंदु तय किए गए:
- रोड सेफ्टी मैनेजमेंट – मजबूत लीडरशिप, ओपन क्रैश डेटा, सालाना पब्लिक रिव्यू और बेहतर एनफोर्समेंट।
- सुरक्षित वाहन और फ्लीट – घटिया पुर्जों पर रोक, अलर्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और सप्लाई चेन की जवाबदेही।
- सुरक्षित रोड यूजर – स्पीड कंट्रोल, हेलमेट और सीट बेल्ट का सख्ती से पालन, AI-आधारित निगरानी।
- पोस्ट-क्रैश रिस्पॉन्स – डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रॉमा केयर इंटीग्रेशन और फर्स्ट रिस्पॉन्डर ट्रेनिंग।
- सुरक्षित ड्राइविंग एनवायरनमेंट – पीपल-फर्स्ट रोड डिजाइन, कमजोर यूजर्स के लिए सुरक्षित सुविधाएं और असुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर पर जीरो टॉलरेंस।
2030 का लक्ष्य और आगे की राह
सरकार और विशेषज्ञों ने मिलकर 2030 तक सड़क हादसों में 50% कमी लाने का लक्ष्य रखा है। यह आसान नहीं होगा, लेकिन यदि सख्त मॉनिटरिंग, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और स्थानीय स्तर पर एक्शन प्लान लागू हुआ, तो तस्वीर बदल सकती है।
सड़क सुरक्षा केवल नियमों की बात नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। जब तक सिस्टम और समाज दोनों मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक हर तीन मिनट में एक जान जाने का यह सिलसिला थमेगा नहीं।