एक लड़की से शादी करते है सभी भाई, भारत के इस गांव में आज भी चल रही है अनोखी परंपरा

अपने महाभारत काल के लिए जरूर सुना होगा कि द्रौपदी ने पांच भाइयों से शादी की और पांचों भाइयों के साथ वह वक्त बताती थी. क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आज के समय में कोई कह दे कि अभी भी ऐसा होता है तो इस बात पर कोई विश्वास करेगा. लेकिन आपको बता दें कि भारत में एक ऐसी जगह है. जहां परिवार के सभी भाई एक ही लड़की से शादी करते हैं. दरअसल देश के हिमालय क्षेत्र के कुछ इलाकों में एक अलग तरह की परंपरा आज भी चर्चा में है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी जगह पर परिवार के सभी भाई एक ही लड़की से शादी करते हैं.

कहां निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा?

कुछ समय पहले हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के ट्रांस गिरी क्षेत्र में दो सगे भाइयों ने एक ही युवती से विवाह कर सभी को चौंका दिया। यह विवाह पूरी तरह पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कई दिनों तक चला और इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। स्थानीय लोगों के अनुसार यह शादी आपसी सहमति से हुई थी और इसमें किसी प्रकार का विवाद नहीं था।

यह क्षेत्र मुख्य रूप से हट्टी जनजाति से जुड़ा हुआ है. जिसे हाल ही में अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) का दर्जा मिला है। इस समुदाय में इस प्रकार के विवाह को स्थानीय भाषा में ‘जोड़ीदार’ या ‘जजदा’ कहा जाता है। हालांकि यह परंपरा अब बहुत कम देखने को मिलती है, लेकिन समय-समय पर ऐसे उदाहरण सामने आ जाते हैं, जिससे यह विषय फिर चर्चा में आ जाता है।

परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हिमालयी क्षेत्रों में इस तरह की बहुपति प्रथा (Polyandry) कोई नई बात नहीं है। पुराने समय में उत्तराखंड के जौनसार बावर, हिमाचल के किन्नौर और सिरमौर के कई गांवों में यह परंपरा प्रचलित थी। 1970 और 1980 के दशक तक ऐसे विवाह अपेक्षाकृत अधिक होते थे, लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा, आधुनिक कानून और बदलती सामाजिक सोच के कारण इनकी संख्या कम हो गई।

फिर भी, कुछ दूर-दराज के गांवों में यह परंपरा सांस्कृतिक पहचान के रूप में आज भी जिंदा है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि यह केवल एक सामाजिक व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य परिवार और जमीन को एकजुट रखना था।

क्यों शुरू हुई यह अनोखी शादी की परंपरा?

इस परंपरा के पीछे सबसे बड़ा कारण माना जाता है सीमित कृषि भूमि और पैतृक संपत्ति का बंटवारा रोकना। पहाड़ी इलाकों में खेती योग्य जमीन बहुत कम होती है। यदि हर भाई अलग-अलग शादी कर अलग परिवार बसाता, तो जमीन छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाती। इससे खेती करना और परिवार चलाना मुश्किल हो जाता।

इसी समस्या के समाधान के तौर पर परिवार के सभी भाई एक ही महिला से विवाह करते थे, ताकि जमीन का विभाजन न हो और परिवार संयुक्त बना रहे। इससे संपत्ति एक ही छत के नीचे रहती और आर्थिक स्थिरता बनी रहती थी।

सुरक्षा और श्रम का संतुलन

पहाड़ी इलाकों में जीवन आसान नहीं होता। कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित संसाधन और दूर-दराज की बसाहट कई चुनौतियां खड़ी करती हैं। ऐसे में परिवार का संयुक्त रहना जरूरी माना जाता था।

जब सभी भाई एक ही परिवार में रहते थे, तो कृषि कार्य, पशुपालन और अन्य जिम्मेदारियां बांटना आसान होता था। इसके अलावा, दूरस्थ क्षेत्रों में सुरक्षा की दृष्टि से भी यह व्यवस्था कारगर मानी जाती थी। परिवार के सभी सदस्य बच्चों की देखभाल और घर की जिम्मेदारी मिलकर निभाते थे।

बच्चों की कानूनी और सामाजिक स्थिति

परंपरागत रूप से ऐसे विवाह में जन्म लेने वाले बच्चों का कानूनी पिता सबसे बड़े भाई को माना जाता था। हालांकि व्यवहार में सभी भाई बच्चों की परवरिश में समान रूप से भाग लेते थे।

गांव के स्तर पर यह व्यवस्था सामाजिक रूप से स्वीकार्य थी और समाज की सहमति से ही ऐसे विवाह संपन्न होते थे। बच्चों को लेकर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता था और उन्हें परिवार का ही हिस्सा माना जाता था।

कानूनी स्थिति क्या कहती है?

भारतीय कानून के तहत बहुपति प्रथा को सामान्य रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार एक व्यक्ति एक ही समय में एक ही विवाह कर सकता है। इस लिहाज से बहुपति या बहुविवाह की अनुमति नहीं है।

हालांकि, कुछ आदिवासी समुदायों में पारंपरिक रीति-रिवाजों के आधार पर विवाह की मान्यता स्थानीय स्तर पर दी जाती रही है। हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पुराने राजस्व रिकॉर्ड में ‘जोड़ीदार प्रथा’ का उल्लेख मिलता है, लेकिन यह आधुनिक कानूनी ढांचे से अलग विषय है।

आज के समय में ऐसे विवाह बहुत कम हैं और अधिकतर मामले समाज की सहमति और निजी समझौते के आधार पर ही होते हैं।

क्या बदल रही है सामाजिक सोच?

शिक्षा, रोजगार के अवसर और बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ने के कारण अब युवाओं की सोच बदल रही है। नई पीढ़ी पारंपरिक रिवाजों की बजाय व्यक्तिगत पसंद और आधुनिक जीवनशैली को प्राथमिकता देने लगी है।

कई युवा अब अलग-अलग विवाह कर अलग परिवार बसाने की ओर बढ़ रहे हैं। इससे संयुक्त परिवार की पुरानी व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। हालांकि कुछ परिवार आज भी अपनी परंपरा को सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखते हैं।

समाज में स्वीकार्यता और विवाद

स्थानीय स्तर पर ऐसे विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिल सकती है, लेकिन व्यापक समाज में यह विषय अक्सर बहस का कारण बन जाता है। कुछ लोग इसे संस्कृति और परंपरा का हिस्सा मानते हैं, जबकि अन्य इसे महिला अधिकारों और कानूनी ढांचे के नजरिए से देखते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के मामलों में विवाह आपसी सहमति से हुए बताए जाते हैं। किसी भी प्रकार के दबाव या जबरदस्ती के आरोप सामने नहीं आए हैं। फिर भी, कानूनी दृष्टि से यह विषय संवेदनशील बना रहता है।

परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो आधुनिक कानून और सामाजिक सोच के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों की बहुपति प्रथा भी उन्हीं में से एक है।

जहां एक ओर यह व्यवस्था ऐतिहासिक और आर्थिक कारणों से विकसित हुई, वहीं दूसरी ओर आज के समय में कानून और सामाजिक बदलाव इसे सीमित कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह परंपरा पूरी तरह समाप्त होगी या सांस्कृतिक पहचान के रूप में बची रहेगी, यह देखने वाली बात होगी।

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